धर्म

चैतन्य महाप्रभु ने घर-घर पहुंचाई कृष्णभक्ति

चैतन्य महाप्रभु (IAST: चैतन्य महाप्रभु; जन्म विश्वंभर मिश्रा) 15वीं शताब्दी के एक भारतीय संत थे, जिन्हें उनके शिष्यों और विभिन्न शास्त्रों द्वारा राधा और कृष्ण का संयुक्त अवतार माना जाता है ।

 

मुगल काल में वैष्णव आंदोलन का प्रचार-प्रसार चल रहा था और उसे पूरे देश में लोकप्रिय बनाने का श्रेय श्री चैतन्य महाप्रभु को जाता है।

पंद्रहवीं शताब्दी में बंगक्षेत्र ने उस भक्तिवीर को जन्म दे दिया, जिसने कृष्ण के वृंदावन को पुन: जागृत कर कृष्ण भक्ति को जन-जन में प्रचारित कर दिया। भक्ति आंदोलन की तारीखें गवाह हैं कि पश्चिमोत्तर के कान्हा की बांसुरी की तान को पुनर्जीवित करने का श्रेय पूरब के चैतन्य को ही जाता है। वही चैतन्य, जिन्हें उनके भक्त आज भी ‘महाप्रभु’ के नाम से बुलाते हैं। उनके भक्त आज भी चैतन्य महाप्रभु में दुर्गा या काली के बजाय कृष्ण और राधा के एक रूप को ही देखते हैं।

चैतन्य महाप्रभु का नाम वैष्णव संप्रदाय के भक्तियोग शाखा के शीर्ष कवियों और संतों में शामिल है। वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की शुरुआत भी चैतन्य महाप्रभु ने की। भजन गायकी की अनोखी शैली प्रचलित कर उन्होंने तब की राजनैतिक अस्थिरता से अशांत जनमानस को सूफियाना संदेश दिया था। लेकिन, वह कभी भी एक जगह टिककर नहीं रहे, बल्कि लगातार देशाटन करते हुए हिंदू-मुसलिम एकता के साथ ईश-प्रेम और भक्ति की वकालत करते रहे। जात-पांत, ऊंच-नीच की मानसिकता की उन्होंने घोर भर्त्सना की, लेकिन जो सबसे बड़ा काम उन्होंने किया, वह था वृंदावन को नए सिरे से भक्ति आकाश में स्थापित करना। सच बात तो यह है कि तब लगभग विलुप्त हो चुके वृंदावन को चैतन्य महाप्रभु ने ही नए सिरे से बसाया।

अगर उनके चरण वहां न पड़े होते तो नि:संदेह कृष्ण-कन्हाई की यह लीला भूमि, किल्लोल-भूमि केवल एक मिथक बन कर ही रह जाती। पश्चिम बंगाल के नादिया जिला, तत्कालीन नवदीप, में 19 फरवरी सन 1486 को पिता जगन्नाथ एवं माता शची देवी के घर श्री चैतन्य अवतीर्ण हुए। माता ने शिशु का नाम रखा निमाई और निमाई के विद्वान नाना नीलाम्बर चक्रवर्ती ने विश्वम्भर नाम से उन्हें सुशोभित किया। परंतु, स्वर्ण की भांति उज्ज्वल पीत कांति होने के कारण समस्त नगरवासी इन्हें गौरसुंदर, गौरांग या गौर हरि इत्यादि नामों से पुकारते थे। प्यार से निमाई भी बुलाया जाने लगा। कारण यह था कि इनका जन्म नीम के पेड़ के नीचे हुआ था। बचपन से ही निमाई की मुखाकृति सरल, सहज और आकर्षक थी। कैशोर्य अवस्था तक निमाई न्याय और व्याकरण में पारंगत हो चले थे।

श्री चैतन्य के अग्रज विश्वरूप कुछ ही समय में विद्वान हो गए थे। और इस असार संसार को नश्वर जानकर 16 वर्ष की अवस्था में उन्होंने गृह त्याग कर दिया था। माता-पिता के साथ घर पर चैतन्य ही अकेले रह गए थे। अधिक विद्वत्ता का परिणाम विश्वरूप का गृहत्याग माता-पिता देख चुके थे। अत: एक मात्र सहायक श्री चैतन्य का अध्ययन बंद करा दिया गया। इसके परिणामस्वरूप चैतन्य अत्यधिक चंचल हो गए। इससे परेशान माता-पिता ने चैतन्य को पुन: अध्ययन आरंभ करा दिया। कुछ समय पश्चात पिता का देहावसान हो गया और तब माता व घर की जिम्मेदारी इन्हीं पर आ पड़ी। अध्ययनरत श्री चैतन्य का अल्पायु में ही श्री वल्लभ मिश्र की सुयोग्य कन्या लक्ष्मीप्रिया से विवाह हुआ। चैतन्य ने कुछ दिन विद्यालय भी चलाया। इसके बाद, पूर्वी बंगाल में श्री चैतन्य ने सर्वप्रथम हरिनाम संकीर्तन का प्रचार-प्रसार आरम्भ किया।

गौरांग के भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। इतना ही नहीं, तब के प्रसिद्ध संत नित्यानंद प्रभु और अद्वैताचार्य महाराज ने भी इनसे दीक्षा ले ली तो जैसे पूरा आर्यावर्त कृष्ण भक्ति में लीन हो गया। निमाई ने इनकी सहायता से अपने आंदोलन में ढोल, मृदंग, झांझ और मजीरा आदि वाद्य यंत्र बजाकर व उच्च स्वर में नाच-गाकर हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया। संन्यास लेने के बाद जब गौरांग पहली बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचे और भगवान की मूर्ति देखते ही भाव-विभोर होकर उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे। अचानक बेहोश हो गए। वहां मौजूद एक विद्वान सार्वभौम भट्टाचार्य ने चैतन्य को उठाया और अपने घर ले आए।

मुगल काल में वैष्णव आंदोलन का प्रचार-प्रसार चल रहा था और उसे पूरे देश में लोकप्रिय बनाने का श्रेय श्री चैतन्य महाप्रभु को जाता है।

 

शास्त्र-चर्चा छिड़ी तो गौरांग ने भक्ति का महत्त्व ज्ञान से कहीं ऊपर सिद्ध कर सार्वभौम को षट्भुज रूप का दर्शन करा दिया। सार्वभौम सीधे गौरांग के चरणों में गिर पड़े। बाद में सार्वभौम ने गौरांग की शत-श्लोकी स्तुति की जिसे आज चैतन्य शतक के नाम से पहचाना जाता है। अपनी उपासना विधि में निमाई ने 18 शब्दों का एक तारक-ब्रह्म-महामंत्र शामिल किया।

चैतन्य महाप्रभु ईश्वर को एक मानते है। उन्होंने नवदीप से अपने छह प्रमुख अनुयायियों को वृंदावन भेजकर वहां सप्त देवालयों की स्थापना कराई। उनके प्रमुख अनुयाइयों में गोपाल भट्ट गोस्वामी बहुत कम उम्र में ही उनसे जुड़ गए थे। रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी व रघुनाथ दास गोस्वामी आदि उनके करीबी भक्त थे। इन लोगों ने ही वृंदावन में सप्त देवालयों की स्थापना की। मौजूदा समय में इन्हें गोविंद देव मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, मदन मोहन मंदिर, राधा रमण मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, राधा श्यामसुंदर मंदिर और गोकुलानंद मंदिर आदि कहा जाता है। इन्हें ‘सप्तदेवालय’ के नाम से पहचाना जाता है।

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