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२६ जनवरी को प्रकाशनार्थ

गिरीश्वर मिश्र

 चौहत्तर साल पहले आज ही के दिन भारत की संसद ने देश की शासन व्यवस्था चलाने के लिए एक संविधान स्वीकार किया था जिसने भारत सरकार अधिनियम-1935 की जगह ली। इस संविधान का आरम्भ उसकी उद्देशिका (प्रिएम्बल) के साथ होता है और उद्देशिका का आरम्भ संविधान को लेकर कुछ आधारभूत स्थापनाओं के लिए भारतीय समाज की प्रतिश्रुति के साथ होता है। ये प्रतिश्रुतियाँ संविधान का आधार बनती है और उसके प्रयोग की सम्भावनाओं और सीमाओं को भी रेखांकित करती हैं। न्याय , स्वतंत्रता , समता  और बंधुत्व के चार मानवीय और सभ्यतामूलक लक्ष्यों को समर्पित ये प्रतिश्रुतियाँ भारतीय समाज की उन भावनाओं के सार तत्व को प्रतिबिम्बित करती हैं जो एक आधुनिक राष्ट्र की परिकल्पना को मूर्त आकार देती हैं । एक तरह से पूरा संविधान ही इन्हीं प्रतिश्रुतियों को व्यवहार में लाने की व्यवस्था का विस्तार करने वाला एक आधुनिक दस्तावेज उपस्थित करता है। यह दस्तावेज इस बात का भी निर्देश देता है कि देश की यात्रा किस तरह से आगे बढ़े और इस बात की निगरानी भी हो सके कि यह यात्रा किस तरह हो रही है। विश्व का यह अब तक का सर्वाधिक विस्तृत संविधान जनता जनार्दन का जयघोष करते हुए जनता को सर्वोच्च शक्ति सम्पन्न होने का सामर्थ्य देता है और सरकार से यह अपेक्षा करता है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा इसका अनुपालन किया जायगा। साथ ही यह प्रावधान भी हुआ कि ज़रूरत पड़ने पर आवश्यकतानुसार लोक-हित में इसमें बदलाव भी लाया जा सकेगा।

एक गम्भीर अर्थ में संविधान की उद्देशिका देश की प्रगति के लिए कसौटी का भी काम करती हैं। यह देशवासियों से पूछती भी हैं कि एक इकाई के रूप में देश की यात्रा किन पड़ावों से गुज़र कर कहाँ पर पहुँची है। इस दृष्टि से निर्वाचित सरकार की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह उन उपायों का प्राविधान कर यह सुनिश्चित करती रहे कि इन महान लक्ष्यों की पूर्ति निर्बाध रूप से हो। प्रजा का सुख या लोक-संग्रह शासन के लिए लक्ष्य के रूप में प्राचीन काल से ही स्वीकृत रहा है। इसे ही ‘राम-राज्य’ भी कहा गया था और जिसका उल्लेख महात्मा गांधी ने भी किया था।

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