अश्लीलता और फूहड़ता में मनोरंजन की तलाश शर्मनाक!

 

मनोरंजन हर इंसान की जरूरत हो सकता है पर स्वस्थ मनोरंजन ही स्वस्थ समाज के निर्माण में सहयोगी बन सकता है. लंबे समय से फूहड़ता के नाम पर नग्नता फूहड़ता और हिंदुत्व विरोधी एजेंडा चला रहा बॉलीवुड आज भी एक के बाद असफलता के बावजूद सुधरने का नाम नहीं ले रहा. ताजा विवाद फिल्म पठान को लेकर रहा जिसमें भगवा रंग गीत और नग्नता से भरपूर दृश्यों के साथ फिल्म का विरोध हुआ. हालांकि फिल्म रिलीज हो चुकी है और इसके निर्माता शाहरूख खान की आरंभिक और रणनीतिक जीत होती दिख रही है. पहले दिन भव्य ओपनिंग ने उनको व्यापारिक संजीवनी भले दी हो पर जरूरी नहीं कि यह सिलसिला लंबा चले. इसके पहले कई फिल्में पहले दिन की बंपर ओपनिंग के बाद भी पिट चुकी हैं. यहां हम यह चर्चा करना चाहेंगे कि जावेद अख्तर सहित कई वामपंथी और लचीले हिंदू उन्हें बड़ा सेक्युलर मानते हैं और दलील देते रहे कि उनकी फिल्म का विरोध जायज नहीं है. तो क्या सेक्युलर होने के नाम पर नग्नता परोसे जाने के बावजूद करोड़ों रूपए उनकी झोली में डाल देना चाहिए. हिंदुत्व की लहरों पर सवार एक बड़े वर्ग का अब फिल्मों से मोहभंग हो चुका है क्योंकि अब लोग पहले जैसे नादान नहीं रहे. नहीं तो खुली छातियां, फटे कपड़े, बेहूदा वेशभूषा, महिला कलाकारों के अश्लील नृत्य और भद्दे संवाद सुनने की आदी हुई जनता ने लंबे समय तक तालियां पीटी हैं. शर्म तो इस बात पर आनी ही चाहिए कि आखिर बॉलीवुड की नग्नता पर खुद भी लोग कब संस्कार त्यागकर मानसिक नग्न हो गए पता हीं नहीं चला. कम से कम खान कलाकारों, वामपंथी फिल्मकारों का एजेंडा सामने आ चुका है और अपने मजहब के प्रति बहुत कुछ विवादित होने के बावजूद उनका लचीला रूख उनकी पोल खुल चुका है. काश! पैसे के लिए पगलाए दुर्भाग्य से हिंदू धर्म में जन्मे हिंदू कलाकार पर्दे पर यूं नग्न न होते तो समाज में भारतीय संस्कारों का पतन न हुआ होता. बहरहाल समय करवट ले चुका दिखता है पर अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है.

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